तान् तितिक्षस्व भारत

तान् तितिक्षस्व भारत

गीता के दूसरे अध्याय के चौदहवें श्लोक में भगवान अर्जुन को कहते हैं - हे अर्जुन, ऐन्द्रिक विषयों से सम्पर्क आने पर यह तुम्हें कभी शीत, कभी गर्मी, कभी सुख, कभी दुख का अनुभव देगा, यही प्रकृति है लेकिन वे आते हैं और चले जाते हैं - हमेशा बने नहीं रहते, अतः इन्हें सहन करना चाहिए - तान् तितिक्षस्व भारत।
यह एक अद्भुत कथन है - जिसकी चिकित्सा नहीं - उसे सहन करना चाहिए -What can not be cured must be endured, चीजों को सहन करना- तितिक्षा- एक महान क्षमता है- यह व्यक्ति परक है यानि हर मनुष्य में अलग-अलग, किसी के पास अधिक तो कहीं कम। हमें इस क्षमता को अपने अंदर विकसित करना चाहिये। प्रत्येक को जीवन के परिवर्तन और अवसरों को सहन करने के लिए कुछ मानसिक बल विकसित करना चाहिए। एक व्यक्ति भगवान से प्रार्थना कर रहा था-‘हे प्रभु, मेरे अन्दर वह शक्ति, सामर्थ्य दो जिससे मैं जो बदलना चाहता हूँ वह बदल सकूँ, साथ ही वह शक्ति व सामर्थ्य भी दो जिससे मैं जो बदलना चाहता हूँ और बदल नहीं पा रहा तो उसको सहन कर सकूँ।’ सद्गुण, नैतिकता व इस प्रकार के आत्ममनस्थिति के बिना हम नहीं सफल हो पाऐंगे। जब हम समुद्र में तैरते हैं तो बड़ी-बड़ी लहरें आती हैं। कुशल तैराक बड़ी लहरों के आने पर नीचे झुक जाते हैं, उनके चले जाने के बाद ही वे ऊपर आते हैं। इस प्रकार वे सदैव लहरों के प्रतिकूल रहकर भी तैरते रहते हैं, क्योंकि वे हमेशा नहीं रहती। इसलिए यह विचार-तां तितिक्षस्व-उन्हें सहन करो क्योंकि वे अनित्याः हैं, सदैव विद्यमान नहीं रहेंगी। यह थोड़ा सा धैर्य महान परिवर्तन ला सकता है। जब हम दुर्बल मानस के हाते हैं तो अवांछनीय परिस्थिति का पहला आघात ही हमें तोड़ देता है। अंग्रेजी में एक प्रसिद्ध गीत है - We shall overcome, We shall overcome, One day- हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब, एक दिन।
आद्य गुरू शंकराचार्य जी विवेकचूड़ामणि के एक श्लोक (2-4) में इसे परिभाषित करते हैं - ”सहनं सर्वदुःखानां अप्रतिकारपूर्वकम्ः चिन्ताविलापरहितं सा तितिक्षा निगद्यते“ - सभी दुखों को बिना चिन्ता के और बिना रोये तथा प्रतिकार की भावना के बिना सहन करना तितिक्षा कहलाता है।

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