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ग्रामीण पर्यटन ?

  दुनिया सस्टेनेबिलिटी के बारे में सीख रही है, वहीं भारत के गांव सदियों से इसे जी रहे हैं। हमारे पूर्वज पेड़ों की पूजा क्यों करते थे? क्या वे अंधविश्वासी थे? या क्या उन्होंने उस साइंस को समझा था जिसे आज की दुनिया क्लाइमेट चेंज, कार्बन क्रेडिट, बायोडायवर्सिटी और सस्टेनेबिलिटी जैसे नामों से पढ़ रही है? पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं है। यह बारिश की नींव है। यह मिट्टी का रक्षक है। यह हजारों पक्षियों, जानवरों और छोटे जीवों का घर है। यह टेम्परेचर को कंट्रोल करता है, पानी के लेवल को बनाए रखता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए लाइफ बैंक का काम करता है। भारतीय संस्कृति ने हजारों साल पहले इस सच्चाई को समझ लिया था। इसीलिए यहां पेड़ों की पूजा होती थी। नदियों को मां कहा जाता था। धरती को मां कहा जाता था। पहाड़ों को देवता माना जाता था। यह सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं थी। यह प्रकृति को बचाने का एक सामाजिक सिस्टम था जिसके लिए किसी कानून, जुर्माने या सरकारी आदेश की जरूरत नहीं थी। लोग नेचर को इसलिए बचाते थे क्योंकि वे उसे अपना परिवार मानते थे। आज पूरी दुनिया एनवायरनमेंट को बचाने के लिए अरबों डॉलर खर्च कर रही है। ले...