चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागषः। तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्।। (4.13)

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागषः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्।। (4.13)


गुण और कर्म की विविधताओं के आधार पर चतुर्वर्ण व्यवस्था मेरे द्वारा बनाई गई थी। यद्यपि मैं इस व्यवस्था का कर्ता हूँ, तथापि मुझे अकर्ता और अपरिवर्तनशील समझो।
चार वर्णों के आधार पर समाज का संगठन-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र - प्रत्येक और किसी भी समाज में अपनी रूचि और क्षमता के अनुसार होते हैं - गुण, कर्म, ”उनके गुणों और कर्मों के अनुसार।“ गुणकर्म यह निर्धारित करेगा कि कोई ब्राह्मण है, क्षत्रिय है, वैश्य है या शूद्र है। किसी भी परिवार में इनमें से किसी भी प्रकार की संतानें हो सकती हैं। विभिन्न व्यक्ति विभिन्न कर्म या धंधा अपने मानस के झुकाव के अनुसार, अपने गुणों के अनुसार करते हैं। यह व्यक्ति की स्वतंत्रता का द्योतक है। आप जो भी व्यवसाय चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं। समाज को संगठन की आवश्यकता होती है - समूहों में संगठन - और ये संगठन हमने भारत में बनाए - पहले श्रम, फिर व्यापार, कृषि, उद्योग, फिर हम प्रशासन - सेना व राजनीति तथा अंत में उच्च बौद्धिक व आध्यात्मिक मार्गदर्शन करने वाले। लेकिन भारत में जो भूल हुई वह यह है कि, काल के प्रवाह में, यह वंशानुगत बन गया, ये पहला दोष है। वंशानुगत क्रम करके हमने इस व्यवस्था को नष्ट कर दिया। दूसरा दोष यह आया कि हमने कुछ को अधिक सुविधाऐं दीं और कुछ को कम। इन दोनों दोषों ने इस व्यवस्था को जर्जर कर दिया है। जब अपने गुण और कर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के व्यवसाय अथवा धंधे को करने की स्वतंत्रता रहती है, किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होता, तब एक स्वस्थ समाज का जन्म होता है। लेकिन जब हम यह स्वतंत्रता रोक देते हैं या भेदभाव करने लगते हैं तो समाज संकीर्ण से संकीर्ण होते हुए जर्जरावस्था में पहुँच जाता है।
जब एक समूह दूसरे समूहों की तुलना में विशेष सुख सुविधाओं की मांग करता है, तो यह एक बड़ा दोष बन जाता है। इससे मुक्ति ही सबल समाज की कसौटी है। एक प्रजातंत्र में भी समाज इस चातुर्वर्ण व्यवस्था को इसकी बुराईयों से रहित कर रखा जा सकता है। जब हम कहते हैं मानव जीवन का और विकास क्रम का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के लिए ब्रह्मणत्व की प्राप्ति है तो इसका अर्थ है - पूर्णतः नैतिक, आत्मनियंत्रित, करूणामयी, आध्यात्मिक व्यक्तित्व। धनोपार्जन की दृष्टि से, मूल भारतीय समाज व्यवस्था में, हम जितना ही ब्राह्मणत्व की ओर बढ़ते हैं , उतना ही परिश्रमिक कम होता जाता है। शूद्र व वैश्य तक पारिश्रमिक  मिलता है, एक क्षत्रिय सदैव धन के ऊपर सम्मान को रखता है तथा ब्राह्मण न तो सम्मान की चिंता करता है, न धन की, उसका जीवन सादगीपूर्ण, सहज व सरलतम होता है।
श्रीकृष्ण प्राथमिक रूप से इस श्लोक में यह बताना चाह रहे हैं कि यद्यपि उन्होंने यह सामाजिक संगठन बनाया है पर वे स्वयं पूर्ण रूप से अनासक्त हैं और कर्ता बिल्कुल नहीं हैं। यह अनासक्ति का विचार मनुष्य के उच्चतर विकास के लिए पूर्णतः आवश्यक है। जब हम अनासक्त होकर कार्य करते हैं तो हम बेहतर तथा तनाव मुक्त होकर कार्य कर पाते हैं। गीता के इन दोनों संदेशों को भारत के समाज जीवन में अपनाने की आवश्यकता आज पहले से और भी ज्यादा शिद्दत से महसूस की जा रही है - तभी हम स्वामी विवेकानन्द जी के शब्दों में अपनी प्यारी भारत माँ को पुनः विश्व सिंहासन पर विराजमान कराने में सफल हो सकेंगे।

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