तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रष्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनः तत्वदर्षिनः।। (4.34

तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रष्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनः तत्वदर्षिनः।। (4.34)


ज्ञानियों को दण्डवत् प्रणाम करते हुए, बार-बार प्रश्न करते हुए और उनकी सेवा करते हुए उस सर्वोच्च सत्य को जानो, जिन्होंने उस सत्य का साक्षात्कार कर लिया है, वे तुम्हें इस ज्ञान का उपदेश देंगे।
ज्ञान की उपलब्धि प्राप्त करने के लिए एक गुरू यानि योग्य सक्षम शिक्षक के पास जाना चाहिए, उसे जानना, समझना चाहिए। भगवान कहते हैं उसके पास जाकर उसे प्रणाम करें, प्रणिपात यानि प्रणाम करना, तत्पश्चात, परिप्रश्नेन यानि गुरू से व स्वयं की बुद्धि से, दोनों से निरन्तर प्रश्न करते हुए ज्ञान प्राप्ति का प्रयास करना चाहिये। प्रश्न करना व उसका उत्तर ढूँढने का प्रयास करना, यह ज्ञान के विकास के लिए आवश्यक है। केवल एक बार प्रश्न करना पर्याप्त नहीं, भगवान कहते हैं, परिप्रश्नेन अर्थात् निरन्तर प्रश्न करना-अनुभव के आधार पर धीरे-धीरे प्रश्नों का स्तर गहरा व गंभीर होते जाना चाहिए, सतही प्रश्न नहीं, उसमें हमारी उत्तर प्राप्त करने की तड़प नहीं दिखती है। यह सब करते हुए श्री कृष्ण कहते हैं, सेवया, अर्थात् गुरू की सेवा करना - यह तभी संभव है जब हमें अपने शिक्षक, गुरू के प्रति मन में श्रद्धा होगी, श्रद्धा बिना सेवा संभव नहीं। सेवा करना आध्यात्मिक एवं चारित्रिक विकास का महत्वपूर्ण स्रोत है। महाभारत में श्रीकृष्ण अनेकों बार दुर्योधन को फटकारते हुए कहते हैं, ”लगता है, तुमने वरिष्ठों की, वृद्धों की सेवा नहीं की है, इसीलिये तुम्हारा चरित्र इतना बुरा है।“ अतः बड़ों की सेवा, उनकी सेवा जो हमसे अधिक जानते हैं, पवित्र श्रेष्ठजनों की सेवा, सदैव आध्यात्मिक साधना मानी जाती है - इससे अपने अहं को नियंत्रण में रखने में सफलता प्राप्त होती है।
विद्यालय में हम ज्ञान की उपलब्धि करने ही जाते हैं, वहाँ विद्यार्थी का व्यवहार अपने शिक्षकों के साथ कैसा हो, यह भगवान हमें गीता के इस श्लोक में बता रहे हैं। प्राथमिक स्तर पर हमें विस्तारपूर्ण उपदेशों, व्याख्यानों की आवश्यकता होती है, उच्च स्तरों पर, मन व बुद्धि का स्तर बढ़ने पर संकेत या सुझाव ही पर्याप्त होते हैं। प्राथमिक स्तर की कक्षा व उच्चतर कक्षाओं की पढाई में यही अंतर होता है। बड़ी कक्षाओं में कई बार शिक्षक प्रश्न का सीधे उत्तर देने की बजाय संकेत में बताते हैं, सुझाव देते हैं कि फलाँ पुस्तक को पढ़ो - इस स्तर पर विस्तारपूर्वक शिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। उच्चतम ज्ञान को बहुत कम कथनों से सिखाया जाता है, विद्यार्थी को स्वयं प्रयोग कर अनुभव लेने के लिए प्रेरित किया जाता है।
ज्ञान प्राप्ति के लिए तद् विद्धि प्रणिपातेन - उन्हें प्रणाम करके जानना, समझना - यह अत्यंत आवश्यक है। अभिमान पूर्ण आचरण विद्यार्थी के लिए ज्ञान प्राप्ति हेतु उचित मनःस्थिति नहीं है। हमें प्रयास करना चाहिए कि हम अपने शिशुओं में, बच्चों में सीखने की ईच्छा पैदा करें यानि उसके हृदय में ज्ञान की अग्नि प्रज्जवलित करने का प्रयास करें। विद्यालय में अध्यापक इस अग्नि को और अधिक बढ़ाकर बड़ी अग्नि बनाने में विद्यार्थी की सहायता करता है, जिससे कि, जो भी उसने सीखा है उसे पचा सके, ग्रहण करे और उसे अपने चरित्र का भाग बनाए। उत्तरोत्तर ज्ञान के स्तर के बढ़ने पर हमारे मोह कम होकर, दुर्बलताऐं खतम होनी चाहिए - इस हेतु सेवा का भाव सतत् जागरूक रखकर नित्य प्रति व्यवहार में लाना चाहिए, ज्ञान साधना की यही उत्तम रीति है।

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