देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत

गीता के दूसरे अध्याय ‘सांख्य योग’ में भगवान आत्मा रूपी अविनाशी तत्व के बारे में समझा रहे हैं। 30वें श्लोक में भगवान आत्मा को ‘देही’ कहते हैं - यानि वह जो देह-शरीर में रहता है। नित्यं अवध्योऽयं - कोई भी, कभी भी इस देही को मार नहीं सकता है। देहे सर्वस्य भारत - हे अर्जुन, सभी शरीरों में यह देही-आत्मा अविनाशी है।
सांसारिक जीवन में कोई मेरी कमीज ले जाता है, उससे मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता, मैं दूसरी कमीज पहन लेता हूँ। भगवान कहते है। सांसारिक जीवन जीते हुए जो इस परम तत्व को जान लेता है, वह भी इसी प्रकार शरीर का मोह नहीं रखता। व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से जितना शक्तिशाली होगा इस सत्य को जीवन के व्यवहार में व्यक्त करने की उसकी क्षमता उतनी ही अधिक होगी, उसमें अधिक साहस व सहनशीलता आ जाएगी। उदाहरणार्थ - हिटलर की नाजी जेल में एक यहूदी वैज्ञानिक Victor Franki भी कैद था - उन सबको भयंकर दबाव, यातनाऐं, बर्बरता, क्रूरता व पीड़ा में रखा जाता था। उस प्रकार की परिस्थितियों में अनेकों लोग मर गए, यह बचा रहा। बाद में उसने एक पुस्तक लिखी - Man's Search For Meaning - वह लिखता है - ”इतने दबावों व यातनाओं में वह टूट सकता था, लेकिन उसने स्वयं को अपने शरीर से पृथक कर लिया, जो हो रहा था, स्वयं को उसका साक्षी समझने लगा। वह इस पद्वति को Attitude Control - मनोवृत्ति का निग्रह कहता है।“ जो दूसरे आप के साथ करते हैं आप उसे नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन आप उन बातों के प्रति अपना दृष्टिकोण नियंत्रित कर सकते हैं। दूसरे केवल हमें थोड़ा कष्ट देते हैं, वे हम ही हैं जो इसे कई गुणा बढ़ा लेते हैं, मनोवृत्ति का यह निग्रह हमें बचा सकता है, इसके सतत् अभ्यास की आवश्यकता हैं| हम अपने स्वयं का रिमोट कन्ट्रोल दूसरों के हाथ में देने से बच जाते हैं , जब श्रीकृष्ण के इस उपदेश को व्यवहारिक आयाम देने का अभ्यास करते हैं। भगवद् गीता हमें यही बताती है कि इस आध्यात्मिक प्रकृति को मानवीय जीवन के संदर्भ में, कार्य और अन्तर-मानवीय सम्बन्धों के संदर्भ में जाना जा सकता है। इसके लिए पृथक से जीवन की कोई आवश्यकता नहीं है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - ‘जीवन स्वयं ही धर्म हैं, धर्म उस दिव्यता की अभिव्यक्ति है जो पहले से मानव में विद्यमान है। यह छुपी हुई है, इसे व्यक्त होने दो।’ अंग्रेज कवि Robert Browning  अपनी एक कविता Paracelsus में इस देही-आत्मा को एक Imprisioned Splendour- बन्दी वैभव कहता है, हम सबमें यह वैभव छुपा है - उसे व्यक्त करना है - यही आध्यात्मिक जीवन है। यही कठोपनिषद कहता है - एष सर्वेषु भूतेषु गूढ़ो आत्मा न प्रकाशते - यह प्रत्येक प्राणी में है लेकिन छुपी हुई है, व्यक्त नहीं होती। हम इसकी अनुभूमि तो कर सकते हैं - यही आध्यात्मिक साधना हैं इस आत्मा का थोड़ा सा भी प्रकाश - अनुभव हमें मिलता है तो मानव सम्बन्धी सारी घृणा, हिंसा, शोषण चला जाएगा।

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