कर्मयोगो विशिष्यते .......... नैष्कर्मं पुरूषोऽश्नुते

कर्मयोगो विशिष्यते .......... नैष्कर्मं पुरूषोऽश्नुते


यदि ज्ञान का मार्ग - सांख्य मार्ग किसी को उच्चतम मोक्ष तक ले जाता है तो कर्म का मार्ग भी किसी को उसी उच्चतम मोक्ष तक ले जाएगा। इन दोनों मार्गों में से कर्म का मार्ग उच्चतर है क्योंकि इससे दोनों फलों की प्राप्ति हेाती है - अभ्युदय और निःश्रेयस - गीता यही बताती है कि किसी विशेष आध्यात्मिक पद्वति को अपनाकर हम अपने प्रत्येक कर्म को अकर्म में बदल सकते हैं। आज की प्रबन्धन तकनीक में यह अध्ययन का एक गंभीर विषय है। अमेरिका के MIT से सम्बन्धित एक चीनी वैज्ञानिक की पुस्तक में लिखा है - ”अनेकों प्रबन्ध तकनीकों से हम सभी समय कार्य करते हैं लेकिन एक विशेष आध्यात्मिक तकनीक द्वारा आप कार्य करते हुए भी कार्य नहीं करते हैं, ऐसी मन की दशा रहती है - शांत व स्थिर-परिणामतः बहुत सा कार्य करने पर भी हम बोझिल अथवा थकान महसूस नहीं करते।“ गीता में कहा गया है कि नैष्कर्म्य यानि कर्मविहीनता कर्म न करने से प्राप्त नहीं की जा सकती। मैं कोई कर्म नहीं करूँगा-यह कर्मविहीनता नहीं - आलस्य है और इस प्रकार के कर्म त्याग से न ही आध्यात्मिक सिद्धि होती है। बेरोजगार व्यक्ति के लिए अवकाश का क्या महत्व है ? एक रोजगार करने वाला व्यक्ति ही अवकाश का आनन्द ले सकता है। पहले कर्म, उसके बाद आता है नैष्कर्मय। आसक्ति रहित, अहं रहित कर्म ही नैष्कर्म्य में परिणीत होता है। ब्रिटिश लेखक एल.पी. जैक्स लिखते हैं - ”यदि आप कर्म ढूँढते हैं, आपको अन्त में अकर्म मिलेगा, यदि आप अकर्म ढूँढते हैं तो उसके अंत में कर्म मिलेगा।“ इसलिए श्री कृष्ण कहते हैं - ”गहना कर्मणे गतिः - कर्म का मार्ग रहस्यमय है।“ हमारे अंदर उपस्थित तामसी, राजसी व सात्विक प्रकृति का असंतुलन हमें सदैव किसी न किसी प्रकार के कर्म में प्रवृत रखता है। कर्म के बाद अवकाश पर जाने पर भी हमारे कर्म के प्रकार बदल जाते हैं - कर्म चलता रहता है-इसे दृष्टा भाव से करते रहने की आवश्यकता है।

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