कर्मण्यकर्म यः पष्येद् अकर्मणि च कर्म यः

कर्मण्यकर्म यः पष्येद् अकर्मणि च कर्म यः


अकर्म में कर्म देखना और कर्म में अकर्म देखना-यह विरोधाभासी प्रतीत होता है, परन्तु मानवीय अनुभव में यह प्राप्त किया जा सकता है, असंभव नहीं है। चीनी विचारधारा, ताओवाद एवं कन्फूशियन विचार में भी यह सिद्धांत मिलता है, जहाँ वे इसे कहते हैं, ‘कोई काम नहीं’ वास्तविक कार्य है। कार्य, बिल्कुल कोई कार्य नहीं रहता, यह तो प्रश्न कर्तापन के भाव व आसाक्ति का है। जब ये दोनों नहीं रहते तो कार्य खेल हो जाता है, सहज हो जाता है। कार्य का विचार तब आ जाता है जब प्रयास, संघर्ष व तनाव रहता है। जब अनासक्ति व कर्तापन का भाव चला जाता है, तब सारा तनाव भी खतम हो जाता है और कार्य करते हुए भी कभी ऐसा नहीं लगता कि कोई कार्य हो रहा है। उदाहरण एक माँ द्वारा अपने शिशु की परिचर्या, इस कार्य को वह कभी बोझ नहीं मानती-जब इस प्रकार का समर्पण व निश्छल प्रेम होता है तभी कार्य बोझ नहीं लगता तथा कर्म करते हुए भी अकर्म का भाव रहता है।
उत्तरोत्तर बढ़ती औद्योगिक सभ्यता ने कार्य को बेगार बना दिया है, जिसके कारण लोग आनन्द को कार्य के बाहर खोजते हैं, इसीलिये इतने सारे अवकाशों की व्यवस्था की गई है। श्री कृष्ण इस प्रकार आनन्द को कार्य से अलग रखने के विचार का प्रतिपादन नहीं करते। वे कहते हैं, कार्य आनन्दपूर्ण हो सकता है, बस केवल हृदय में प्रेम चाहिये। आसक्ति के साथ किए गए कर्म से महान कार्य नहीं हो सकते तथा इस प्रकार के कर्म करते समय हमारा संतुलन भी ठीक नहीं रह सकता। कार्य करना स्वयं में आध्यात्मिक अनुभव हो सकता है। अतः कार्य को बेगार समझना भूल है तथा अवकाश के समय व कार्य करते समय, दोनों ही अवसर पर हम आनंद प्राप्त कर सकते हैं। अवकाश का मतलब, एक शांत जीवन का अतिरिक्त दिन। अमेरिका के M.I.T के वैज्ञानिक R.G.H.Sieu, Tao of Science में कहते हैं - ”विकेन्द्रीकरण के ज्ञान से परिचित होने के लिए, प्रबन्धक को ताओ के अकर्म के सिद्धान्त का भान  होना चाहिए, उपलब्धियाँ प्राप्त की जाती हैं कुछ न करने की कला से। चुआंग-त्से बताते हैं -
"ज्ञान का विद्यार्थी प्रतिदिन सीखने का ध्येय रखता है,
ताओ का विद्यार्थी प्रतिदिन खोने का ध्येय रखता है,
निरंतर खोते रहने से, वह कुछ न करने पर पहुँचता है,
और कुछ न करने पर, हर बात हो जाती है।
वह जो संसार को जीतता है, कुछ न करके अधिकतर ऐसा करता है,
जब कोई कुछ करने को विवश है, संसार पहले से ही उसके जीतने से परे है।“
अर्थात् एक दार्शनिक प्रबन्धक तात्विक रूप से, कार्य को ज्ञान की उचित गति से करता है, आंतरिक रूप से वह आध्यात्मिक सहनशीलता विकसित करता है व बाह्य रूप से से सामाजिक भलाई करता है - यानि अंदर ऋषित्व व बाहर राजा सदृश्य। यह अनासक्ति का भाव स्वयं के निम्न ‘स्व’ से अनासक्ति है।
अष्टावक्र गीता में कहा गया है - (18.61)
निवृत्तिरपि मूढ़स्य प्रवृतिरूपजायते,
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्ति फल भागिनि -
एक मूर्ख व्यक्ति की निवृत्ति प्रवृति में बदल जाती है, और एक बुद्धिमान की प्रवृत्ति निवृत्ति में अर्थात् कर्म विहीनता के फल को प्राप्त करती है। निवृत्ति का अर्थ है - कार्य विहीनता व प्रवृत्ति का कार्य युक्त्ता। केवल कार्य को करने में कोई महानता नहीं, यह तो कार्य करने वाले की दृष्टि पर निर्भर है। कार्य करते हुए भी विश्रांति अनुभव लिया जा सकता है। कई बार आज हम कार्य करते हुए कहते हैं कि ‘बोर’ हो रहे हैं। यह बोरडम (Boredom) शब्द 18वीं सदी के डॉ0 जानसन के अंग्रेजी शब्दकोष में है ही नहीं। यदि आज का बालक या युवा बोरडम का अनुभव करता है तो इसका अर्थ है कुछ गड़बड़ है क्योंकि यह आध्यात्मिक रिक्तता के कारण उत्पन्न जीवन से थकान का ही अनुभव है। एक प्रशिक्षित मन द्वारा अधिकतम कार्य करते हुए भी विश्रांति का अनुभव हो सकता है, यदि हम कार्य की जड़ों तक जाऐं तो हमें वहाँ अकर्म ही मिलेगा। यदि हम अवकाश और अकर्म की जड़ों तक जाऐं तो वहाँ कार्य ही मिलेगा। इसीलिए श्री कृष्ण कहते हैं कि कार्य की गति अति गूढ़ है। अतः कार्य करें, अवकाश के लिए भी जाऐं परन्तु कार्य को बेगार समझकर नहीं, कार्य करें तथा कार्यजगत से अलग कहीं अवकाश न ढूँढे। यह बोरडम से आनन्द की यात्रा न हो अपितु आनन्द से आनन्द की यात्रा हो।

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