न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते


इस संसार में ज्ञान के समान पवित्रता प्रदान करने वाला कुछ भी नहीं है। हम अपने शरीर व कपड़ों को जल व साबुन से धोकर स्वच्छ करते हैं, यह तो केवल बाह्य शरीर की साफ सफाई है। मन व बुद्धि की स्वच्छता हेतु, पवित्रता तो ज्ञान यानि सत्य के ज्ञान से ही आ सकती है। अतः इस ज्ञान की अग्नि को अपने अंदर सदैव प्रज्जवलित करके रखना चाहिए तथा इसकी प्रखरता तीव्र से तीव्रतर करते हुए सत्य का अन्वेषण करने का प्रयास करते रहना आवश्यक है। जिसके अंदर ज्ञान की यह अग्नि जितनी मात्रा में प्रज्जवलित होगी, वह उतना ही पीड़ा, तनाव व दबाव को सहन करने में समर्थ होगा। इस प्रकार जीवन को सफलतापूर्वक व्यवहार में लाने की क्षमता ज्ञान की अग्नि पर निर्भर करती है जो हमने अपने हृदय में प्रज्जवलित कर रखी है।
ज्ञान की अग्नि प्रज्जवलित कराना, यह एक अत्यन्त श्रेष्ठ विचार है। वह ज्ञान जो हमें शिक्षा के द्वारा मिलता है वह केवल पुस्तकीय होने के लिये नहीं है, अपितु वह ज्ञान समन्वित चरित्र के रूप में झलकना चाहिए। ‘न हि ज्ञानेन सदृशं’, जब मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी, तब  उन्होंने इस वाक्य को अपने आदर्श वाक्य  Motto के रूप में लिया था। आदर्श वाक्य की भूमिका क्या होती है ? आदर्श वाक्य का कोई महत्व नहीं रहता है जब उसे जीवंत कर अनुभव में लाने की ईच्छा न हो। कई बार हम देखते हैं कि विद्यालय में छात्र दीवार पर, कुर्सी या मेज पर या अन्यत्र अपना नाम आदि लिख देते हैं। वे कभी यह प्रश्न अपने आप से नहीं करते कि क्या मुझे इस प्रकार कुछ लिखना चाहिए ? यह दिखाता है कि वह विवेक की अग्नि, ज्ञानाग्नि अभी उनमें प्रज्जवलित नहीं हुई है। छोटी छोटी घटनाओं में हम जीवन में ज्ञान की अग्नि की उपस्थिति अनुभव में कर सकते हैं। फिर सारा व्यवहार ही बदल जाएगा। गीता के पूर्व श्लोक में कहा गया है - ”ज्ञानास्तिः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरूते तथा“ - ज्ञान की इस अग्नि से सभी कर्म भस्मीभूत हो सकते हैं।
देवी महात्मय के एक श्लोक में जगन्माता दुर्गा की कीर्ति आती है (1.47) - ‘ज्ञानमस्ति समस्तस्य जतोरविषय गोचरे’ - ‘इन सब प्राणियों में उनका ज्ञान केवल इन्द्रिय उपकरणों में रहता है, इससे उच्चतर कुछ नहीं। कोई ऐन्द्रिक अनुभव हुआ तदनुरूप एक प्रतिक्रिया होती है। केवल मनुष्य में ही सीमित ऐन्द्रिक स्तर के ज्ञान से पार बौद्धिक स्तर के ज्ञान में जाने की क्षमता है। वह ज्ञान अंतिम वास्तविकता के ब्रह्म के ज्ञान में और अधिक विकसित किया जा सकता है। उस वास्तविकता का नाम ही ज्ञान है, वह ज्ञान स्वरूप अथवा चित्र स्वरूप है।’ स्वामी विवेकानन्द जी कहते हैं - ‘शिक्षा उस पूर्णत्व का प्रकटीकरण है जो मनुष्यों में पहले से ही विद्यमान है।’ सर्वं कर्माखीलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते - सभी कर्म अपनी सम्पूर्णता में, ज्ञान में अपनी परिपूर्ति पाते हैं। हमें भी इसी ज्ञानमय तपस् का अभ्यास करना चाहिए। कितना बड़ा परिवर्तन हमारी शिक्षा पद्वति व विद्यार्थियों में आ जाएगा यदि वे इस ज्ञानमय तपस् के अभ्यास की आदत शुरू से डालें, ज्ञान की खोज की यह उत्सुकता हमारे विद्यालयों में प्राथमिक स्तर से ही डालनी चाहिए।
स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा को ‘विचारों का आत्मसात्करण’ कहा। जो भी ज्ञान मैं प्राप्त करता हूँ, मैं उसमें रूपान्तरित हो जाता हूँ, इसी प्रकार से चरित्र का विकास होता है।

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