परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।


भगवान श्री कृष्ण गीता के चौथे अध्याय के इस श्लोक में अवतारों के अवतार लेने के कारणों को स्पष्ट रूप से बता रहे हैं। वे कहते हैं - ‘सदाचारियों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए तथा धर्म की स्थापना के लिए युग युग में अवतार आते हैं।’ संसार की अच्छी स्थिति में पालन अवतार का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। आदिगुरू शंकराचार्य जी गीता की अपनी टीका में कहते हैं कई बार काल के प्रवाह में सामाजिक ताना बाना टूट जाता है, मनुष्य को एक दूसरे से जोड़ने की कड़ियाँ शिथिल पड़ जाती हैं, तब वह समाज विखण्डित होने लगता है-हिंसा, अपराध, असंतोष बढ़ने लगता है। इस स्थिति को कोई बुद्धिजीवी, राजनीतिज्ञ या कर्मकाण्डी मत/पंथ के नेतृत्वकर्ता नहीं बदल सकते, केवल एक दिव्य शक्ति ही इसे बदलने का सामर्थ्य रखती है। नैतिक व आध्यात्मिक उन्नति किसी निश्चित मानव स्थिति में केवल उच्च आध्यात्मिक व्यक्तित्वों से ही आ सकती  है, किसी अन्य साधन से नहीं। इसलिए भगवान कहते हैं ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर अवतार आते हैं।
स्वामी विवेकानन्द अपने व्याख्यानों में कहते हैं - ‘त्याग और सेवा, भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं। हमें इसकी इन धाराओं में तीव्रता उत्पन्न करने की आवश्यकता है, और शेष अपने आप सब ठीक हो जाएगा। इस देश में आध्यात्मिकता का झण्डा कितना भी ऊँचा क्यों न किया जाए, वह पर्याप्त नहीं होता। केवल इसी में भारत का उद्धार है।’
महान विचारों को फैलाने में समय लगता है। भगवान बुद्ध के उपदेशों को फैलने में सहस्राब्दीयों का समय लगा था। लेकिन पतन होने में तुलनात्मक रूप से कम समय लगता है। भारत की यह एक उज्जवल परम्परा रही है कि यहाँ पर एक के बाद अनेक ऐसे अवतरणों की एक अनवरत श्रंखला रही है यानि दिव्य का यह अवतरण भारतीय संदर्भ में बार-बार हो रहा है। अन्य देशों में यह एक ही बार हुआ है। ईसाई मत में ईसामसीह आए, लेकिन तत्कालीन समाज ने उन्हें स्वीकार नहीं किया, सूली पर लटका दिया। यह पर्याप्त नहीं कि अवतरण हो, यह भी आवश्यक है कि लोगों को भी उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह भारत में अनुपम है, यहाँ एक ऐसा दर्शन व संस्कृति की धारा सदैव रहती है जो अपने महान शिक्षकों को मृत्यु दण्ड नहीं देते, उन्हें समझने का प्रयास करते हैं। पहले कुछ लोग समझते हैं, बाद में और ज्यादा। ये अवतार प्रेम, करूणा, सद्भावना, सहनशीलता का एक प्रवाह प्रारम्भ करते हैं और सैंकड़ो, शताब्दियों तक लोगों की श्रद्धा का पात्र बने रहते हैं। इसी को आध्यात्मिकता का जागरण कहते हैं - समाज में नव रचना बनाना, मूल्यों की स्थापना करना व सम्पूर्ण समाज अनुप्राणित होकर स्वप्रेरणा, स्वानुशासन से, परोपकार की भावना से कार्य करें - यही तो सच्चे अर्थों में धर्म की स्थापना करना है। भारत में यह अखण्ड परम्परा रही है - इसीलिए तो भारत को ‘मृत्युन्जयी भारत’ कहा जाता है।

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