ज्ञानतपसा पूता

ज्ञानतपसा पूता


‘ज्ञानतपसा पूता’ - यानि ज्ञान के तपस् द्वारा शुद्धिकृत होकर। ज्ञान - यानि आध्यात्मिक ज्ञान को तपस् की श्रेणी में रखा गया है। तपस् - यानि साधना, ज्ञान की साधना। इस ज्ञान की साधना द्वारा अपने मन, व्यक्तित्व का शुद्धिकरण करना। इस ज्ञानतपस् के लिए स्व अनुशासन, आत्मसंयम एक आवश्यक तत्व है। जब शिक्षा से ज्ञानार्जन की प्रक्रिया से तपस् निकल जाता है तो शिक्षा सस्ती व हल्की हो जाती है। आज समाज में यही सस्ती शिक्षा का प्रचलन सर्वदूर दिखता है। शिक्षा से ज्ञानतपस् का भाव पूर्णतः समाप्त हो गया लगता है। मानव मन को ज्ञान की खोज के स्तर तक उठाया जाना चाहिए और जो सीखा है उसे पचाकर ग्रहण करना चाहिए, यही तपस् है। यह एक अत्यन्त कठिन साधना है-ज्ञान को पचाना।
ज्ञानतपस् का दूसरा पहलू है - क्रोध, वासनाऐं, घृणा, भय आदि की भावुकताओं को ज्ञान की अग्नि में जलाना-इसी से चरित्र निर्माण होता है। अतः इस मानव मन और शरीर को एक परिशुद्धिकरण का कारखाना बनाना होगा, मनोवैज्ञानिक परिशुद्धिकरण का कारखाना। इसी से सभी नीतिगत व मानवीय मूल्य-प्रेम, करूणा, अभय, सेवा का भाव बाहर आएगा। इस सभी मूल्यों का स्त्रोत असीम एवं नित्य शुद्ध, नित्य मुक्त आत्मा शरीर-मन की गहराईयों में स्थित है - यही वेदान्त की शिक्षा है। हम सदैव बाहर की वस्तुओं के बारे में ही सोचते रहते हैं। हमने शिक्षा के इस अन्तर्मुखी दृष्टिकोण के बारे में बहुत कम विचार किया है। शारीरिक तपस् अत्यन्त साधारण तपस् है-कुछ सहनशक्ति का मापदण्ड मात्र, लेकिन ज्ञान तपस् गहराई की साधाना है, मनोवैज्ञानिक परिशुद्धिकरण के कारखाने को अपने अंदर स्थापित करने की साधना है। कोई और इसे हमारे लिए नहीं कर सकता, हम अन्य लोगों से केवल मार्गदर्शन ले सकते हैं परन्तु मूलतः यह करना हमें ही है। गीता भी इसलिए हमें यह बार-बार कहती है कि तुम स्वयं अपने शत्रु हो और तुमहीं अपने मित्र भी - यह तुम्हें तय करना है कि तुम क्या हो। बचपन से ही बालकों को इस ज्ञानतपस् की शिक्षा का अभ्यास कराना चाहिए। थोड़ी बहुत मात्रा में इसे सभी कर सकते हैं, इसका थोड़ा सा भी प्रयास आश्चर्यजनक परिवर्तन लाने का सामर्थ्य रखता है। शंकराचार्य जी तपस् की व्याख्या में कहते हैं - ‘मनसश्च् इन्द्रियाणां च एकाग्र तप उच्चते’ - मन और इन्द्रियों की एकाग्रता तपस् कहलाती है। वेदान्त कहता है इसी जीवन में, किसी भविष्य के जीवन में नहीं, हम इस ज्ञान तपस् की भावना को सिद्ध कर सकते हैं। शारीरिक सुख प्राप्त करना अंतिम उद्देश्य नहीं है, यह तो सुख प्राप्ति का प्रारम्भ है - हम प्रारम्भ के स्तर पर ही अटके न रहें, हम ऊपर उठें और अंतिम लक्ष्य तक पहुंचे-यही सच्चे अर्थों में मानवीय विकास क्रम है। आज अपनी ज्ञान पिपासा का अर्थपूर्ण बनाने का आवश्यकता है। स्वामी विवेकानन्द ने इसी की प्रेरणा देते हुए कहा - ‘उत्तिष्ठित जागृत प्राप्य वरान्तिबोधत’ - उठो, जागो और आगे बढ़ो तब तक जब तक लक्ष्य को प्राप्त न कर लो, यही युवोचित आह्वान है। संसार में रहने मात्र से हम संसार नहीं बनते, ऐन्द्रिक स्तर पर अवरूद्ध हो जाने से संसारी बने रहते हैं - इससे ऊपर उठकर आध्यात्मिक स्तर पर पहुँचने का हमारा प्रयास रहना चाहिए - मन की यही दिशा हो - ततः किम् - इसके आगे क्या ? यह खोज व यात्रा आगे बढ़ती रहे - यही वेदान्त की शिक्षा है।

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