वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरूच्यते

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरूच्यते


भगवान कह रहे हैं जिसने व्यक्ति के लिए हानिकारक तीन भावुकताऐं - राग, भय, क्रोध यानि लगाव, डर, गुस्सा जीत ली हैं वह व्यक्ति स्थिर बुद्धि वाला मुनि है।
ये तीनों भाव एक सीमा के बाद समाज में प्रसन्नता और शांति के लिए हानिकारक हैं। वेदान्त में सभी जगह भय को बुरा माना गया है। हम सामान्यतः बच्चों के विकास क्रम में उनके अंदर भय डालकर प्रशिक्षित करते हैं - भूत का भय, पुलिस का भय, फेल होने का भय आदि आदि। वेदान्त कहता है ‘यह गलत है, बच्चों को अभय में बढ़ने दो।’ स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - ‘अभय एक सद्गुण है, भय पाप है।’ सामान्य भय जैसे यदि बाघ या शेर है तो मैं उसको गले नहीं लगाऊँगा-यह बुद्धिमता है, युक्तिसंगत है, लेकिन अवास्तविक भय जो व्यवहार को असामान्य बना देता है, उससे बचना चाहिए। कई बार हम बच्चों को भय द्वारा नैतिक बनाना चाहते हैं, वेदान्त के चरित्र निर्माण के मनोविज्ञान में इस प्रकार के भय का कोई स्थान नहीं है। वे बालक जो अभय में पलते हैं वे स्वभावतः नैतिक होंगे, जीवन में सहज व स्वाभाविक होंगे।
क्रोध पर नियंत्रण करना अत्यन्त कठिन है, फिर भी हमें इस पर नियंत्रण हेतु मन का सतत् प्रशिक्षण करना ही अपेक्षित है। हमें क्रोध आता है, मैंने नियंत्रण खो दिया, बाद में सोचना चाहिए ऐसा क्यों हुआ, मैं नियंत्रित रहूँगा - और यह अभ्यास व प्रयास निरंतर चलना चाहिए। हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय में Prof. William Mac Douglas की पुस्तक Character And Conduct Of Life (चरित्र और जीवन का आचरण) में क्रोध की समस्या की अच्छी व्याख्या है कि इसे कैसे नियंत्रित कर, इसका उपयोग कैसे किया जाए। मनोविज्ञान के अनुसार कोई भी भावुकता जिसमें क्रोध भी सम्मिलित है, अपने आप में बुरी नहीं है किन्तु हमें यह जानना चाहिए कि उसका उपयोग कैसे किया जाए।
क्रोध का मानव जीवन में स्थान है। अपने चारों ओर व्याप्त अनाचार, अत्याचार, व्याभिचार आदि के प्रति क्रोध जगना ही चाहिए परन्तु उसके कारण की जाने वाली प्रतिक्रिया पर बुद्धि का नियंत्रण चाहिए। यदि यह क्रोध ही नहीं होगा तो हम सही प्रतिक्रिया ही नहीं कर पायेंगे। अतः क्रोध को सामाजिक हित के उपयोग के उद्देश्य के लिए योग्य दिशा प्रदान की जानी चाहिए। इसे ही Prof. Mac Douglas, Righteous Indignation - सदाचारपूर्ण कोप कहते हैं। दूसरी ओर अनुपयोगी क्रोध भी हममें बहुत है - घर में, आश्रितों के प्रति अपने व्यवहार में - इसे शिक्षित करने की आवश्यकता है। भारत में हमारी यह बहुत बड़ी कमी है कि हमारे अंदर सदाचारी कोप का भाव कम है, इसलिए हम गलत बातों को सहन करते रहते हैं।
हमारी प्रत्येक भावुकता शिक्षित व अनुशासित की जा सकती है - यह ऊर्जा का हम सकारात्मक उपयोग कर सकते हैं। इस प्रकार भावुकताओं को सृजनात्मक आयाम देकर चरित्र निर्माण किया जा सकता है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा, ”नियंत्रित और कार्य के प्रति निर्देशित भावुकता ही चरित्र है।“ दंभ, घमंड और अहं से निकला हुआ सामान्य क्रोध पूर्णतः एक जड़ कोटि की ऊर्जा है। क्रोध को नियंत्रित करने के अनेकों उपाय लोगों ने बताए हैं जैसे-अनियंत्रित क्रोध के प्रत्येक अवसर पर अपने आप को दंडित करना अथवा जिस व्यक्ति के प्रति क्रोध किया उससे शान्त होने पर क्षमा मांगना। हम कोई भी उपाय करें परन्तु उसका अभ्यास सतत् चलता रहे। सतत् जागरूकता एवं प्रयास ही सफलता के निकट पहुँचा सकता है।
इसी प्रकार लगाव रूपी भावुकता भी मोह का निर्माण कर हमें संकट में अथवा हमारी मुक्तता में बाधक है। यह मोह किसी के भी प्रति हो सकता है-व्यक्ति, घर, वस्तु, कुर्सी, पद आदि। अतः भगवान हमें कह रहे हैं - स्थिर बुद्धि रखो तभी मुनि कहलाओगे। मुनि यानि मननशील व्यक्ति, भावुकता पर नियंत्रण रख प्रतिक्रिया देने वाला। Burtend Russel कहते हैं - हर बच्चे में एक स्वाभाविक विचारशीलता की स्थिति होती है परन्तु हमारी आज की शिक्षा पद्वति उसके इस गुण को समाप्त कर उसे केवल जानकारी रट कर अपेक्षित रूप से प्रस्तुत करने वाली बना रही है। अध्ययन और स्मरण पर बल देने के कारण यह विचारशक्ति का गला घोंट रही है तथा उसे मुनि यानि विचारशील व्यक्तित्व बनने से रोक रही है। समाज का सारा विकास हमारे सोचने की क्षमता पर ही निर्भर है। हम अपने स्तर पर भी मुनि हो सकते हैं। जितनी बड़ी संख्या में ऐसे मुनि समाज में होंगे - वहाँ का समाज विकास के स्तर पर उतना ही ऊपर उठ पाएगा।

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