तपस्या का तात्पर्य व महत्व

 तपस्या का तात्पर्य व महत्व
जहाँ कहीं ज्ञान के लिए सच्ची प्यास है, वहाँ कोई मार्ग की थोड़ी असुविधाओं की
परवाह नहीं करेगा। ज्ञान की खोज एक तपस्या है। गीता में भगवान कहते हैं - ‘बहवो
ज्ञान तपसा पूता’-अनेक लोग ज्ञान की तपस्या से पवित्र होकर। यदि पूरा देश इस ज्ञान
तपसा की भावना से अनुप्राणित हो जाए, तो हमारे राष्ट्र जीवन में अद्भुत प्रगति होगी।
आदिगुरू शंकराचार्य महाभारत के एक श्लोक को उद्घृत करते हुए ‘तपस्या’ शब्द की
परिभाषा करते हैं - ‘मनसश्च् इन्द्रियाणां च एकाग्य्रम् हि परम् तपः’-मन तथा इन्द्रियों की
शक्तियों को एकाग्र करना ही परम तप है। आधुनिक वैज्ञानिक भी यही करते हैं-वे अपने
मनों को वैज्ञानिक पद्धतियों व दृष्टिकोण में प्रशिक्षित कर प्रकृति के अन्तर में प्रवेश करने में
सक्षम होकर युगों से छिपे हुए उसके रहस्यों को उजागर करते हैं |
हमारे सभी विद्यार्थियों को स्कूल/कॉलेज में प्रवेश लेते समय तपस की यह धारणा
सामने रखनी चाहिए। हमारी संस्कृति में तपस् व स्वाध्याय एक साथ चलते हैं। स्वाध्याय
का अर्थ है-अध्ययन। महर्षि वाल्मिकी जी द्वारा रचित रामायण इन शब्दों के साथ प्रारम्भ
होता है-‘तपः स्वाध्याय निरतं नारदम्’ - नारद जो निरन्तर तपस तथा स्वाध्याय में निरत
रहते हैं। अतः ज्ञान मुद्रा की धारणा के पीछे तपस व स्वाध्याय स्थित रहते हैं। रूक कर
अवरूद्ध हो जाना ही संसार कहलाता है। जब हम एन्द्रिय स्तर पर अपने विकास को रोक
लेते हैं तो संसारी होते हैं। लेकिन जब हम एक शिशु की भांति जो पहले केवल खाने-पीने
व खेलने में मग्न था, अब ज्ञान प्राप्ति के क्षेत्र मे आगे बढ़ता है- जीवन की इस विकास
यात्रा में जब हम इन्द्रियों के स्तर के परे-उसके द्वारा बद्ध सीमाओं के पार जाते हैं, तभी
अपनी सत्य प्रकृति व अनंत सम्भावनाओं को समझ पाते हैं-यह सारी प्रक्रिया ही वास्तव में 
तपस् कहलाती है। यह तपस् गृहस्थ जीवन में भी किया जा सकता है। यद्यपि हम बड़े हो
गए, शिक्षित बन गए फिर भी बच्चों व खिलौनों से खेलते हैं-इसमें कोई बुराई भी नहीं है।
इस प्रकार हम बच्चों का उत्साहवर्धन ही कर रहे होते हैं जिससे आप शुष्क प्रकार के
तपस्वी न बन जाएँ। श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे-‘शुष्क ज्ञानी मत बनो, हे दिव्य
माता, मुझे शुष्क ज्ञानी मत बना देना।’ उस प्रकार का तपस्वी जीवन जिसमें मुस्कुराहट न
हो, सहजता न हो, उसका वेदान्त में कोई स्थान नहीं है।

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