रसवर्जं रसोऽप्यस्य

रसवर्जं रसोऽप्यस्य.......
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ........
तानि सर्वाणि संयम्य .........


कई बार ऐसा होता है कि हम कहते हैं, आज मैं कुछ नहीं खाऊँगा, उपवास रखूँगा, निराहार भी रहते हैं परन्तु मन में अच्छे भोजन की ईच्छा अत्यन्त तीव्र रहती है - यानि इन्द्रियों के विषयों को अपने सामने से हटा देने पर भी रस की लालसा हमारे मन में रहती है। हमारे पुराणों में एक कथा है जिसमें भगवान शिव तपस्या करते हैं - कालिदास के नाटक कुमार संभवम् में इसका सुन्दर वर्णन है - प्रत्यर्थ भूताम् अपि तां समाधेः सुश्रूषमानां गिरीशो अनुमने, विकारहेतौ सति विक्रियन्ते येवां न चेतांस त एव धीराः - जब पार्वती ने तपस्यारत् शिव की सेवा करने की अनुमति के लिए अनुनय-विनय किया, शिव जानते थे कि यह उनकी तपस्या में बाधक हो सकती है, फिर भी उन्होंने इसकी अनुमति दी। कालिदास कहते हैं, ऐसा शिव कर सके क्योंकि वे धीर थे, बुद्धिमान और सहासी थे, इन परिस्थितियों से भयभीत नहीं थे क्योंकि उनके मन तब भी चंचल नहीं थे, जब चंचल होने की परिस्थितियाँ होती हैं। आगे चलकर शिव ने पार्वती के साथ विवाह भी तब किया जब वो तपस्या की अग्नि में तप कर निकली। इसलिए कालिदास आगे कहते हैं - ‘जगतः पितरौ वन्दे, पार्वती परमेश्वरौ’ - मैं शिव और पार्वती को इस जगत के माता-पिता के रूप में प्रमाण करता हूँ। अतः भगवान कह रहे हैं - ऐन्द्रिक विषयों के संदर्भ में हमें सतत् सर्वकाल में सजग रहना चाहिए, इनके कठोर नियमन के हमारे प्रयास में कभी भी शिथिलता नहीं आए क्योंकि ये उपद्रवी इन्द्रियाँ पूर्णता के लिए प्रयत्नशील एक बुद्धिमान व्यक्ति का भी मन बलपूर्वक हरण कर लेने की क्षमता रखती है।
यही बात मनुस्मृति में भी कही गई है - बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति - समस्त इन्द्रिय प्रणाली अत्यन्त बलशाली है, वे एक विद्वान को भी हर लेती हैं।
देवी महात्मय में इसको माया के रूप में वर्णन किया गया है। श्री रामकृष्ण हमें समझाते हैं कि यह आद्यशक्ति माया, दो रूपों में कार्य करती है-मायाशक्ति-एक अविद्याशक्ति-जो हमें नीचे की ओर खींचती है, दूसरी-विद्याशक्ति-जो ऊपर की ओर उठाती है। हम अपने में बहुत सी शक्तियों को व्यवहार में लाते हैं, वे शक्तियाँ हमें अपना दास भी बना सकती हैं या हम उनके स्वामी बनकर भी रह सकते हैं, लेकिन यह तभी संभव है जब हम स्वअनुशासन का सावधानीपूर्वक कठोरता से अभ्यास करते हैं। हिन्दी में एक कहावत है - कम्बल छोड़ता नहीं, यह अनुशासन की कमी का परिचायक है। स्वामी विवेकानन्द जी बार-बार हमें कहते हैं - ‘स्वामी की भांति कार्य करो न कि दास की भांति।’
गीता में भी यही कहा है - तानि सर्वाणि संयम्य - संयम का अर्थ है अनुशासित करना, नियंत्रित करना। यही समस्त चरित्र निर्माण का प्रारम्भ है। ऐन्द्रिक वृत्तियों के कुछ प्रशिक्षण की आवश्यकता है। बचपन में हमारे माता-पिता, कुटुंबीजन हमें इसमें सहायता करते हैं, बाद में विद्यालय में गुरू सहायता करते हैं परन्तु अन्तत्वोगत्वा यह कार्य हमें स्वतंत्र रूप से स्वयं ही करना है। अतः इन ऐन्द्रिक विषयों को ‘नहीं’ कहने का हमारा स्वयं का अभ्यास सतत् करते रहना चाहिए। यह शक्ति हमें केवल आध्यात्मिक आयाम से ही आ सकती है। यदि मैं इनको संचालित नहीं करूँगा तो ये मुझे संचालित करने लग जाऐंगी। नीचे की ओर फिसलना भी एकाएक नहीं होता, कदम दर कदम धीरे धीरे हम नीचे गिरते हैं और शुरू में पता भी नहीं चलता। जब पता चलता है जब तक गति इतनी तीव्र हो जाती है कि हम कुछ कर नहीं पाते और दुर्योधन की भांति कहते हैं - ‘मैं यह जानता हूँ कि धर्म क्या है, पर उसमें रूचि नहीं और मैं यह भी जानता हूँ कि अधर्म क्या है पर उसमें मेरी रूचि है।’ -
जानामि धर्मम् न च में प्रवृत्तिः
जानामि अधर्मम् न च मे निवृत्तिः

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