क्लैवयं मा स्म गमः - नैतत्व युपपद्यते

क्लैवयं मा स्म गमः - नैतत्व युपपद्यते

कुरूक्षेत्र के रण मैदान में शोक व मोह में फंसे अर्जुन को भगवान मनोविज्ञान की दृष्टि से भले ही उपचार कर रहे हों, परन्तु वास्तव में वे हमें ही संबोधित कर रहे हैं। उनका यह सार्वकालिक संदेश मोह, हताशा, शोक आदि में डूबे समस्त मानव जाति के लिए ही है। वे कहते हैं - ”क्लैव्यं - ये नपुसंकता, दुर्बलता, अपौरूषेय विचार तुम्हारे अंदर कहाँ से आ गया। नेतृत्व युपपद्यते - यह तुम्हारे योग्य नहीं हैं, इस प्रकार की हताशा यह तुम्हारे योग्य नहीं है।“ यह संदेश सभी के लिए है - विशेषतः बच्चों को बताना चाहिए - यह कार्य तुम्हारे उपयुक्त नहीं है। तुम इतने अच्छे हो, कुलीन हो, सामर्थ्यवान हो - तो यह व्यवहार तुम्हारे प्रकृति के प्रतिकूल है। जब हम यह किसी को कहते हैं तो इसका अर्थ है कि हम उसको सम्मान दे रहे हैं जो अपने मूल स्वभाव को भूल गया है। यह आग्रह एक सकारात्मक आग्रह है। इस समस्त शिक्षा में असम्मोहित करने का गुण है। कोई दुर्बलता आ गई है जिसने उसके सच्चे स्वरूप को अवरूद्ध कर दिया है। स्वामी विवेकानन्द भी भारतवासियों को संबोधित करते हुए कहते हैं - ”हम बहुत दिन रो चुके, अब और रोने की आवश्यकता नहीं। अब अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और मर्द बनो।“
जब हम कठिनाईयों में होते हैं और अपनी आंतरिक शक्तियों का भान नहीं रहता, हम टूट रहे होते हैं तब श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हमको यह कहते हैं, ऐसे समय किसी को आना चाहिये, जो हमारे ऊपर पड़े मोह की चादर को झटके से उतार सके, नई प्रेरणा दे सके - वह जो हमारे अंदर मौजूद शक्ति को स्पर्श कर उसे व्यक्त करने में सहयोग कर सके। सामाजिक सम्बन्धों में हम दूसरों के प्रति दो बातें कर सकते हैं - या तो दूसरे का आत्मविश्वास नष्ट कर दें या फिर उसे बढ़ा दें। भारत में हमने अधिकतर नकारात्मक कार्य किया है-परस्पर आत्मविश्वास नष्ट किया-अब इसे बदलने की आवश्यकता है। दुर्बलता कोई गुण नहीं है, दुर्बलता और सद्गुण कभी साथ नहीं हो सकते। अतः धर्म और सद्गुण का विचार बल और अभय से जुड़ा हो। यही सकारात्मकता है। दुर्बलता सदैव सबलता से ही हटाई जा सकती है - केवल बल ही संसार के रोगों का उपचार है। हम जितने आध्यात्मिक बनते हैं, उतने ही निर्भय व बलशाली बन जाते हैं, उतने ही करूणामय भी। इस स्थिति में आने के लिए हमें सदैव प्रयत्नशील रहना होगा, कठोपनिषद में यही आहृान इन शब्दों में मिलता है (-1.3.14) - ‘उत्तिष्ठत जागृत प्राप्य वरान् निबोधत्।’ मानव विकास की परिकल्पना में विकास का प्रारम्भ भावनाओं को नियन्त्रण करने से है। पशु और मानव में यही फर्क है। भावनाओं को नियंत्रित करने के बाद मानव परिस्थितियों को समझने का प्रयास करता है तद्नरूप अपने आप को ढालता है इस पूरी क्रिया में ही हमें उस व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो ‘नेतृत्व युपपद्यते’ कहकर हमें सहारा, प्रेरणा दे सके। मनुष्य की इसी श्रेष्ठता का वर्णन प्रसिद्ध नाड़ी वैज्ञानिक ग्रे वाल्टर अपनी पुस्तक The Living Brain में करते हैं। हम मनुष्य को विचारशील जानवर कहते हैं - जब यह विचारशीलता हट जाती है तो हम जानवर मात्र रह जाते हैं।

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