लोकसड्ग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि

लोकसड्ग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि


भगवान कहते हैं कि लोकसंग्रह को सुनिश्चित करने की दृष्टि से भी, मानव समाज के स्थायित्व के लिए, तुम्हें कर्म करने चाहिए। भगवान राजा जनक का उदाहरण हमारे सामने रखते हैं, वे राजा होते हुए अपने सब प्रकार के कर्म आसक्ति रहित होकर करते हैं, कर्मयोग के माध्यम से अपने अंदर अध्यात्मिक ऊर्जा को उन्होंने प्राप्त किाय। हमें भी सांसारिक जीवन में कार्य करते हुए इस आध्यात्मिक प्रकाश को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए - स्वहित से ऊपर उठकर लोकहित यही एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए। लॉर्ड एक्टन का एक प्रसिद्ध कथन है - ”शक्ति या सत्ता भ्रष्ट करती है, अतिशय शक्ति या अत्यधिक सत्ता अतिशय भ्रष्ट करती है।“ गीता हमें जीवन तथा कार्य का ऐसा दर्शन प्रदान करती है जिससे शक्ति को भ्रष्ट होने से बचाया जा सकता है। मान लीजिए विशेष परिस्थितियों के कारण हमें कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं, फिर भी हमें कार्य करना चाहिए क्योंकि अन्य व्यक्ति हैं जिन्हें हमारी सहायता की आवश्यकता है। इसी को लोकसंग्रह कहा गया। लोकसंग्रह की नीति, संसार का कल्याण। जैसा गांधी जी और दीनदयाल उपाध्याय जी ने आगे अन्त्योदय के अपने विचार में कहा, मेरे समाज के अंतिम रोेते हुए व्यक्ति के आंसू पोछने के लिए मैं हूँ। यहाँ पर भी कर्म करने की प्रेरणा है, लेकिन यह स्वयं के लिए नहीं है-यह लोक कल्याण के लिए है। यद्यपि हम स्वयं इस संसार में समस्याओं से ग्रस्त रहते हैं फिर भी एक दूसरे की सहायता करते रहें, यही भगवान कह रहे हैं, यही परस्परं भावयन्तः का विचार है।
पं0 दीनदयाल जी उपाध्याय द्वारा हमारे सामने रखा गया अन्त्योदय की कल्पना यही बताती है कि, ”जब भी किसी कार्य पर तुम्हें संदेह हो, तो शांत रहकर अपने आप से यह सवाल करो कि यदि मैं यह कार्य करता हूँ, तो क्या इससे समाज की पंक्ति में खड़े सबसे अंतिम व्यक्ति का कोई भला होगा। यदि होगा तो उस कार्य को अवश्य करो।“ किसी कर्म को करने या न करने का चुनाव करने का यह विचार गीता हमें बताती है। लोकसंग्रह के इस दर्शन का अल्पांश भी यदि हमारे देश में सबके द्वारा अपना लिया गया तो देश कितनी प्रगति कर सकता है इसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण हमें एक सार्वभौम सत्य बताते हैं कि समाज में साधारण लोग उच्चतर लोगों का अनुकरण करते हैं, इसलिए समाज के महत्वपूर्ण लोगों को अपना उदाहरण उनके समक्ष रखना चाहिए - गीता के अगले श्लोक में यही कहा गया है -
यद्यद् आचरति श्रेष्ठः तत्तदेवतरो जनः।
स यत् प्रमाणं कुरूते लोकस्तत् अनुवर्तते।।
गीता में आगे यही कहा गया है कि एक विद्वान को, श्रेष्ठ लोगों को समस्त संसार में सुख और कल्याण की भावना से ही कर्मरत् रहना चाहिए। जब एक प्रजातंत्र में हम नागरिक कर्तव्यों की बात करते हैं तो हमें यह विचार मिलता है कि एक नागरिक वह नहीं होता जो केवल एक राष्ट्र में रह रहा है अपितु वह जो राष्ट्र का है और राष्ट्र के लिये है।

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