न बुद्धिभेदं जनयेत् अज्ञानां कर्मसाघिòनाम्। जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान युक्तः समाचरन्।।

न बुद्धिभेदं जनयेत् अज्ञानां कर्मसाघिòनाम्।
जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान युक्तः समाचरन्।।


किसी को कर्म में आसक्त अज्ञानी लोगों की बुद्धि को विचलित नहीं करना चाहिये, प्रबुद्ध व्यक्ति, जो स्वयं योग के भाव से कर्म में युक्त है, उसे चाहिये कि वह अज्ञानी को भी सभी कर्मों में लगाए रखे। अर्थात् विद्वान व्यक्ति अज्ञानी को अपना सुधार करने में सहायता तो करे परन्तु उनके मनों तथा दृष्टिकोणों को विचलित नहीं करना चाहिए - उन्हें स्वयं समझने दें, कदम-दर-कदम धीरे धीरे। एक अमेरिकी लेखक ब्रूस बार्टन ने अपनी एक पुस्तक में लिखा, ‘एक अच्छा शिक्षक वह है जो विद्यार्थी के स्तर पर आता है और फिर उसे धीरे-धीरे उठाता है।’ न्यूयार्क में 1896 में ‘मेरे गुरूदेव’ विषय पर बोलते हुए स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था - ”किसी मनुष्य की श्रद्धा नष्ट मत करो। यदि हो सके तो उसे जो कुछ अधिक अच्छा है दे दो, यदि हो सके तो जिस स्तर पर वह खड़ा है, उसे सहायता देकर ऊपर उठा दो - परन्तु जिस स्थान पर वह था, उस जगह से नीचे उसे मत गिराओ, सच्चे गुरू ऐसे ही कार्य करते हैं। सच्चा शिक्षक वही है जो विद्यार्थी को सिखाने की दृष्टि से विद्यार्थी की ही मनोभूमिका में तुरन्त उतर आए और अपनी आत्मा विद्यार्थी की आत्मा से एक रूप कर सके, वह शिष्य की दृष्टि से देख सके, उसी के कानों से सुन सके तथा उसीके मस्तिष्क से समझ सके-ऐसा ही गुरू शिक्षा दे सकता है-अन्य दूसरा नहीं। अन्य सब नकारात्मक, निरुत्साहक तथा विनाशकारी गुरू कभी भलाई नहीं कर सकते।“
अतः जो काम वह कर रहा है प्रबुद्ध जन उसी काम को करते हुए उनके समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनका सम्पर्क मात्र ही उन व्यक्तियों को ऊपर उठने की प्रेरणा देने के लिए पर्याप्त है।

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