कैसे सृजित होते हैं चाणक्य

 कैसे सृजित होते हैं चाणक्य ? ~


ये प्रश्न आज की पीढ़ी को अक्सर सताता है और

अक्सर हम चर्चा करते समय कह देते हैं कि वर्तमान में चाणक्य नहीं पैदा होते । कभी हैरान हो जाते हैं  आचार्य चाणक्य की दूरदर्शिता और बुद्धिबल पर । युवा विष्णु से  आचार्य चाणक्य बनने के सफर से हम में से बहुत कम ही परिचित हैं । चलिए आज चाणक्य के चाणक्य बनने की कथा बताने आपको प्राचीन मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र की ओर ले चलें जहाँ धनानंद का साम्राज्य था । 


मगध तब देश के सबसे बड़े और शक्तिशाली गणराज्यों में एक था। घनानन्द आत्मकेन्द्रित, अत्याचारी और अय्याश था। सुरा-सुन्दरी उसकी कमजोरी थी। किसी युवती का हरण कर उसे राजमहल पहुँचा देना अथवा राज्य के सैनिकों द्वारा किसी धनिक के खजाने को लूट लेना आम बात थी। उस राज्य का महामन्त्री था शकटार जो परम तेजस्वी और विद्वान था परन्तु राज्य के मर्यादाहीन आचरण को नियन्त्रित कर पाना उसकी क्षमता के बाहर था । शकटार अराजकता के विरुद्ध था पर राजा के प्रति निष्ठा रखना वह अपना धर्म समझता था। दूसरी ओर था महामन्त्री शकटार का सहयोगी अमात्य राक्षस जो राजा घनानन्द का निकटस्थ और उसके कुकृत्यों का साथी था। शासक और व्यवस्था की कमियों का लाभ उठा अमात्य राक्षस सत्ता पर हावी था वहीं शकटार महामन्त्री हो कर भी स्वयँ को निरुपाय और असहाय पाता ।

दबी, डरी और विवश प्रजा के समक्ष अगर कोई उनकी आवाज बन खड़ा था तो तो वह था एक साधारण शिक्षक चणक जो प्रत्येक पीड़ित के अधिकारों के लिये अनवरत संघर्ष करता हुआ राज्य की निरंकुशता को चुनौती देता। चणक मगध साम्राज्य का सच्चा हितैषी और देशभक्त था और सम्राट घनानन्द के कुकृत्यों से मगध को मुक्त कराना उसे अपना सहज धर्म प्रतीत होता। चणक महामन्त्री शकटार का बचपन का मित्र और गुरु-भाई था पर आज महामन्त्री शकटार घनानन्द की स्वेच्छाचारी राज्य सत्ता का प्रथम प्रहरी था और चणक प्रजा का हितरक्षक विद्रोही।

शकटार अक्सर चणक को शान्त रहने और अनावश्यक संघर्ष मोल ना लेने की सलाह देता पर चणक के स्वभाव में सह-सह कर जीना था ही नहीं। उनके क्रन्तिकारी स्वभाव के कारण उनका परिवार संकट में रहता पर उस दवाब में जीते हुए उनके पुत्र विष्णुगुप्त (चाणक्य) ने सीखी स्पष्टवादिता, भयमुक्त जीवन, अपने अहित की चिन्ता किये बिना सत्य के लिये खड़े होने का दुःसाहस। चाणक्य ने देखा कि उन्मत्त सत्ता भी सत्य के पक्ष में अकेले खड़े शक्तिविहीन और सामान्य शिक्षक चणक से किस प्रकार आक्रान्त और भयभीत है। उन्होंने आभाष किया कि ज्ञानी और विवेकी शकटार का राज्य की राजनीति में कोई दखल नहीं जबकि कुटिल राक्षस पूरे गणराज्य पर पूर्णतः हावी है। मगध की राजनीति के हर दाव-पेंच को उसने अपने पिता चणक और महामन्त्री शकटार के वैचारिक द्वंदों से सीखा। दवाब में उत्साहपूर्वक जीना उसने राज्य के दमन चक्र को झेल-झेल कर सीखा। चणक की राष्ट्रहित को लेकर व्यग्रता बनी चाणक्य की जीवनी शक्ति। शकटार के समक्ष बोले गये चणक के शब्द बने अमृत मन्त्र - "राष्ट्रहित के लिये मैं अपने और अपने परिवार के इस जीवन की तो क्या, आने वाले सौ जीवन की भी बलि चढ़ा दूँ तो कम है।" चाणक्य ने शकटार के नेत्रों में देखी चणक के लिये अपार श्रद्धा और विवशता।

हर बीतते पल के साथ सृजित होता रहा चाणक्य। और इस सृजन यज्ञ की पूर्णाहुति हुई उसके पिता चणक की बलि के साथ जिन्हें अाखिर घनानन्द ने बन्दी बना कारागार में मरवा दिया। शकटार भी बचा न पाया अपने बाल सखा को। कारागार में जाते हुए चणक ने समझाया था चाणक्य को - "भावनायें तुम पर हावी ना हों, उद्देश्य स्पष्ट हो और त्याग की तत्परता हो। मोह मत पालना और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना। जीवन एक यज्ञ है और पल-पल आहुति देनी पड़ती है। " बिना अश्रु बहाये चाणक्य ने चरण-स्पर्श किये थे पिता के।

ऐसे सृजित होते हैं चाणक्य।

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